हिंदी की दुविधा

- प्रदीप चंद्र जोशी  आज राग दरबारी पढ़ते हुए, अचानक हिंदी, किताब से बाहर आ गयी। बाहर निकल पीले रुंधे हुए पन्नों पर बैठ गयी। पहले तो मैं केवल राग दरबारी पर ध्यानमग्न रहा, किन्तु जब हिंदी ने दो बार मुझे घूर कर देखा तो "निज भाषा सम्मान" के कारण मुझे ध्यान उसकी ओर ले जाना... Continue Reading →

Create a website or blog at WordPress.com

Up ↑